संदेश

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

जमीन -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

चित्र
बात बहुत पुरानी है। आज से करीब दो सौ साल पहले की। एक महान संत थे। उनकी दृष्टि में अपने-पराये का भेद न था। उनसे जो भी मिलता उनका अपना बन जाता। उन्हें जो भी दक्षिणा स्वरूप धन मिलता उसे वे  ईश्वर का प्रसाद समझकर सभी जरूरतमंदों को  बांट देते। वे अपने पास कुछ भी धन नहीं रखते थे। वे निस्पृह भाव से परमात्मा के भजन  में तल्लीन रहते। जिसे वाकई मदद की जरूरत होती उसे उनसे मिलकर अपनी समस्या का समाधान मिल जाता । अकिंचन और निर्धनों पर उनकी विशेष कृपा होती। उनके इस दिव्य - व्यवहार की प्रसिद्धि  सर्वत्र फैल चुकी थी। उनके प्रिय शिष्यों में एक उनके सगे भतीजे भी थे जो शैशवावस्था में ही मातृ-पितृ विहीन होकर उनके साथ-साथ रह रहे थे। वे जहां भी जाते वे उनके साथ होते। भगवान के अनन्य भक्त को ही वे अपने माता-पिता के रूप में देखते। अपने संत पितृत्व के प्रति सदैव सेवाभाव से तल्लीन रहते। एक दिन एक शिष्य के मन में यह ख्याल आया कि जब तक संत जी का आशीर्वाद इन के ऊपर है तब तक तो इन्हें कोई आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा परंतु जब संत जी की छत्रछाया इनके ऊपर नहीं रहेग...

बेवजह -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

चित्र
बेवजह    तो    कोई    सवाल  नहीं होता. प्यार  में  उमर  का  तो  ख्याल नहीं होता. अभी तो एक कली -सी खिल रही हो तुम; बरना  दिल   का   ऐसा  हाल  नहीं  होता. तुम  दिल  में  कुछ  तो बात दबा लेती हो; नहीं  तो  मन  में  अब  मलाल  नहीं होता. दिल  की  बात  आखिर  मैं  कहूं  तो कैसे; बचने   को   तो    कोई    ढाल  नहीं  होता. तेरे    ख्यालों   में    खोया  हूं   कुछ   ऐसे; अब  खुद  का  भी  जो  ख़्याल नहीं होता. प्यार  की  सजा  स्वयं  पड़ती  है भुगतनी; किस्मत  का  कभी  भी कमाल नहीं होता.                           -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

तुम्हारी आँखें -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

चित्र
तुम्हारी  आँखें तुम्हारी   आँखें    भी   क्या  कमाल  करती हैं. बिना   छुए   ही   मुझे  मालामाल  करती हैं. मैं  तो  जब भी कभी  खुद को  भूल जाता हूं, ऐसे  में   वे   मेरा   बहुत   ख्याल   करती हैं. बस  एक  बार  भी यदि नजरें नहीं मिले तो जाने  वे  मुझसे  कितने   सवाल   करती हैं. तुम तो अक्सर मुझसे  बात भी नहीं करती, और  वे  तो  दिल  का   घर  संभाल  लेती हैं. एक  तुम  हो  जो  जख्मों को छूती भी नहीं, और   एक    वे   जो   दुपट्टा    डाल   देती हैं. ये   कोमल,  लाल,  लाजवाब  हैं  तेरे  होंठ, पर सच पर आख़िर पर्दा  क्यों डाल देती हैं?                         ...

तुझे क्या मिला -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

चित्र
तिरंगे  का   करके  अपमान  तुझे  क्या मिला? ओ  धरती  के भगवान!  बता  तुझे क्या मिला? तुम    तो    कहते   थे   तिरंगा   मेरी   शान  है; तुम    तो   कहते    थे   तिरंगा   मेरी   जान  है; खोकर  अपनी  पहचान  बता तुझे  क्या मिला? ओ   धरती  के  भगवान  बता  तुझे क्या मिला? पूछता  है   अब लाल   किला  का  यह  प्राचीर; रक्षा   में   जिसकी   मिट  गए  हैं   कितने  वीर; तुम  बस  भांजते  रह   गए  हो  यहां   शमशीर; शर्मसार  कराके   बलिदान   तुझे   क्या  मिला?                                     -धर्म...

आँखें -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

चित्र
तेरे      तो      दोनों     नैना   कजरारे  हैं.                     जिससे  मिलें  बस  उसी के बारे-न्यारे  हैं. कैसी   अजीब   उलझन  -सी   तन्हाई  है; आज  कहाँ   तुमने  यह   रात   बिताई  है; तेरी   तो    दोनों   अँखिया    अलसाई  हैं; मेरे   सपनों   को   कहाँ     छोड़  आई  हैं;                      जाने   तूने   किसके   भाग्य   सवारे  हैं! राज   निखर   रहे   तेरे  नयन   -कोरों   से; काले   बालों    के    बिखरे  -से   डोरों  से; कंचुकी   की...

भक्त हरिनाथ : - डॉ.सुरेश पाठक

चित्र
( डॉ.  सुरेश पाठक हिंदी के प्रसिद्ध समालोचक थे। उन्होंने भक्त हरिनाथ और उनके साहित्य पर बहुत ही महत्वपूर्ण शोध परक अनेकानेक निबंध लिखे हैं। यहां प्रस्तुत है उनके द्वारा पांच दशक पूर्व लिखे गए भक्त हरिनाथ की जीवनी पर आधारित दो निबंध जो क्रमशः 'कल्याण' और 'शाकद्वीपीय ब्राह्मण बंधु' में प्रकाशित हुए थे। आशा है, इससे पाठकों की  भक्त हरिनाथ की जीवनी  संबंधी जिज्ञासा कुछ हद तक शांत होगी !) कृष्णभक्त कविवर हरिनाथजी (लेखक -श्रीसुरेशजी पाठक, साहित्याचार्य, एम.ए.) श्रीहरिनाथजी पाठक  गया (बिहार) जिलेके जहानाबाद अनुमण्डलान्तर्गत पाठक बिगहा नामक गाँवमें संवत् १९०० में भक्तवर श्रीहरिनाथजी पाठकका आविर्भाव हुआ था। प्रारंभमें आपने अपने पूज्य पितासे वेद-वेदाङ्गकी शिक्षा प्राप्त की और तत्पश्चात गया जिलेके मकसूदपुर ग्रामके महान् विद्वान् आचार्य शिवप्रसादजी मिश्रसे वेद-वेदाङ्ग, उपनिषद्, वेदान्त और सांख्यका विशिष्ट अध्ययन किया। साधनामें बहुत आगे होनेके कारण आचार्य मिश्रजीने अपने शिष्यको उच्च कोटिका साधक बनाया। पाठकजी हिंदी और संस्कृतके रससिद्ध कवि भी थे।         ...

मैंने देखा -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

चित्र
मैंने  एक अमीर देखा.... बिका हुआ  जमीर देखा.... नंगा नाचता हुआ मन पर ढका हुआ  शरीर देखा.... इस सर्द मौसम में  मैं कांप रहा था... और वह  मेरे अरमानों की  अंगीठी ताप रहा था......! -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मोहब्बत -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

प्राणों का जंगल -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

अलग ही मजा है ! -धर्मेन्द्र कुमार पाठक