तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

आँखें -धर्मेन्द्र कुमार पाठक


तेरे      तो      दोनों     नैना   कजरारे  हैं.

                    जिससे  मिलें  बस  उसी के बारे-न्यारे  हैं.

कैसी   अजीब   उलझन  -सी   तन्हाई  है;
आज  कहाँ   तुमने  यह   रात   बिताई  है;
तेरी   तो    दोनों   अँखिया    अलसाई  हैं;
मेरे   सपनों   को   कहाँ     छोड़  आई  हैं;

                     जाने   तूने   किसके   भाग्य   सवारे  हैं!

राज   निखर   रहे   तेरे  नयन   -कोरों   से;
काले   बालों    के    बिखरे  -से   डोरों  से;
कंचुकी   की   झीनी   पड़ी  -सी    छोरों से;
नाजुक  -नाजुक  अँगुलियों   के   पोरों   से;

                    जाने  किसने   चूमे   कपोल  तुम्हारे  हैं?
 
तुम  आस जगाकर सहसा भूल गयी क्यों?
तुम विश्वास दिलाकर मुझे छल गयी  क्यों? 
अपने   वादों   से   तुम   खेल   गयी क्यों?
प्यार  की  कस्ती  से  मुझे  ठेल गयी  क्यों?

आज    भी     तेरे    सपनों    के   सहारे   हैं. 

                         ये  आँखें   देखती  राह  तुम्हारे है.

                                        -धर्मेन्द्र कुमार पाठक. 
 



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