तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

तुम्हारी आँखें -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.




तुम्हारी  आँखें


तुम्हारी  आँखें   भी  क्या  कमाल  करती हैं.
बिना   छुए   ही   मुझे  मालामाल  करती हैं.

मैं  तो  जब भी कभी  खुद को  भूल जाता हूं,
ऐसे  में   वे   मेरा   बहुत   ख्याल   करती हैं.

बस  एक  बार  भी यदि नजरें नहीं मिले तो
जाने  वे  मुझसे  कितने   सवाल   करती हैं.

तुम तो अक्सर मुझसे  बात भी नहीं करती,
और  वे  तो  दिल  का   घर  संभाल  लेती हैं.

एक  तुम  हो  जो  जख्मों को छूती भी नहीं,
और   एक    वे   जो   दुपट्टा    डाल   देती हैं.

ये   कोमल,  लाल,  लाजवाब  हैं  तेरे  होंठ,
पर सच पर आख़िर पर्दा  क्यों डाल देती हैं?

                            -धर्मेन्द्र कुमार पाठक. 

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