तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

बरसात -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

                   बरसात          

रात प्रात हो गई ! वाह! क्या बात हो गई !!
जीवन से आज मौत की अब मात हो गई ॥

भ्रमर गूंज रहे कुसुमों के उन्नत वृन्त पर,
मुग्ध तितलियाँ भी तो उनके साथ हो गईं॥

कलरव करते उतर आये पक्षियों के वृन्द,
पुनः मिलने की तब उनसे बात हो गई ॥

अनमने मदिर ऊँघते गगन में ये बादल,
पर्वतों से फिर उनकी मुलाकात हो गई ॥

आज अचानक मौसम ने ली है अँगड़ाई,
जंगल की आग अब  यहाँ शांत हो गई ॥

आज वन-उपवन का मन बाग-बाग हो गया,
प्यासी धरा पर  झमाझम  बरसात हो गई ॥

                                -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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