तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

इंजोरिया में चांद (मगही कविता) -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

इंजोरिया में चांद इतरा रहल हे.
चंदनिया घूघवा सरका रहल हे.

चित चकोर के चंदा चुरा रहल हे,
बगिया में चंदनिया नहा रहल हे.

धरती अपन रूप के सजा रहल हे,
ओकर घूघवा बदरा उठा रहल हे.

मन में घुंघरू कोई बजा रहल हे,
सुरवा गीतिया के सजा रहल हे.

चंदनिया मन ही मन सकुचा रहल हे,
चांद तक-तक के मुख मुसका रहृल हे.

बदरिया चंदवा के छिपा रहल हे,
चंदनिया के मन ललचा रहल हे.


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