क्या करूं?
डूब गई नाव यहां तो पतवार का क्या करूं?
घर घर ही नहीं रहा तो दीवार का क्या करूं?
जब बोली में मिठास ही नहीं रही अब बाकी;
तो दिल में उमड़ रहे प्रभूत प्यार का क्या करूं?
जब तुम कभी हम सबको अपना समझे ही नहीं;
तो सिर्फ दिखावे के सद्व्यवहार का क्या करूं?
जब ईश्वर से अपना यह दिल ही नहीं जुड़ सका;
तो इस सुंदरतम, सुखमय संसार का क्या करूं?
जब बीमार पिता ही हमारे साथ नहीं रहे;
तो आखिर अब इस अनमोल अनार का क्या करूं?
जब बाग में खिलने को कोमल कलियां ही नहीं;
तो यहां मौसम-ए-बसंत-बहार का क्या करूं?
जब वे मुसीबत में कभी साथ देते ही नहीं;
तो ऐसे काबिल रिश्तेदार का मैं क्या करूं?
जब रहा एक - दूसरे पर ऐतबार ही नहीं;
तो ऐसे खास भले यार का अब मैं क्या करूं?
-धर्मेन्द्र कुमार पाठक.
बहुत सुंदर ।
जवाब देंहटाएंBhut Sundar Rachana
हटाएंBhut Sundar
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