अचरा से उड़ा द त जानी
अबकी सवनमा में,
खेत-खलिहनवा में,
जम के बरस गेलो पानी!
रह-रह के कजरारे,
बदरा इ बरियारे,
कर हौ मनमानी।।१।।
हरिअर-हरिअर खेतवा में,
अरिअन के बीचवा में,
धनवा के अजबे जवानी।।२।।
जब-जब तोरा से,
प्रीत के कटोरा से,
मिलेला हम ठानी।।३।।
जतरा पर बदरा,
दिखाके उ नखरा,
कर हौ मनमानी।।४।।
इस जुल्मी बदरा के,
धरती के भॅवरा के,
अपन तू अचरा से,
उड़ा द त जानी।।५।।
प्यार के इयाद लेके,
बेमौसम बरसात लेके,
पुलकित हौ अंखियां में पानी।।६।।
ओठवा के लाली में,
कनमा के बाली में,
बतियावइत हौ प्यार के बतिया पुरानी।।७।।
टेढ़-मेढ़ रहिया में,
कसल-कसल बहियां में,
घघरा तोर गगरा के सुनावौ कहानी।।८।।
धुक-धुक छतिया में,
प्यार के पतिया में,
सहेज के तू रखले ह हमर निशानी।।९।।
-धर्मेन्द्र कुमार पाठक.
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