तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

क्या किया जाए -धर्मेन्द्र कुमार पाठक




क्या   किया   जाए!

वह कागज भी तो नहीं  जिस पर  लिखा  जाए!
चलो  आज  कुछ  घूंट  मस्ती  का  पिया  जाए!

तुम  यूं  ही मिल के बिछड़  जाती  हो  हर  बार,
इस  बार  जब  मिलो  तो  साथ  में   रहा  जाए!

दिल   एक   है   और    तमन्नाएं   भी   हैं   एक, 
आखिर कब तक छुप-छुप कर यहां मिला जाए!

जिंदगी  का  तो  तय  है  एक  दिन  मिट  जाना,
फिर क्यों ना अब कुछ पल साथ में जिया जाए!

पल - पल   में  बदल   जाते   हैं  इरादे  आखिर,
बेवफाई   के   मौसम   में   क्या   किया   जाए!

                                 -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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