तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

मेरी ख्वाहिशें -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

मेरी ख्वाहिशें

मेरी ख्वाहिशें  बच्ची की तरह ठुनकती रहीं. 
बार -बार  अपना  इरादा  खूब बदलती रहीं.

वे  ढूंढ  रहीं थीं  अपनी हमजोली प्यारी-सी,
बस  उसी के  एहसासों पर तो मचलती रहीं.

सपने  संजोए  उसी के  लिए अपने दिल में,
जो ठोकरें  खाकर भी हर बार संभलती रहीं.

अब  तुझे  क्या  बताऊं अपनों की हकीकत,
जिनकी  यादें  सदा दर्द बनकर उभरती रहीं.

-धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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