तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

कोई मिल रहा होगा! -धर्मेन्द्र कुमार पाठक


कोई मिल रहा होगा! 

कलियों का मुखड़ा यूं ही नहीं खिला होगा।
भौरों ने  कानों में   जरूर  कुछ कहा होगा।।

झाड़ियों  के  पत्ते  यों  ही  नहीं  हैं   हिलते;
कोई  तो  अवश्य  ही  वहां  रह  रहा होगा।।

धुआं  तो  बेवजह  कभी भी उठता ही नहीं;
आग का शोला तो अवश्य जल रहा होगा।।

वह इतरा के इस तरह कभी फुदकती नहीं;
कोई -न -कोई  चुपके  से  मिल  रहा होगा।।

-धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मोहब्बत -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

प्राणों का जंगल -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

अलग ही मजा है ! -धर्मेन्द्र कुमार पाठक