तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

कायल हो गया...! -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

कायल हो गया....!

तेरी  सुंदर  निगाहों  का  कायल  हो  गया!
दिल  मासूम  था  बेचारा  घायल  हो गया!

जाने  क्यों  नजरें  मिला के  चुरा  लेती हो, 
दिल कभी घुंघुरू तो  कभी पायल हो गया!

जब  तेरे-मेरे   दिल  का  दिल से  करार है;
तेरा कॉल कहीं और  क्यों  डायल हो गया!

बेचैनी  में  दिल  की   कैसी   हालत  मेरी;
वफ़ा का  बेवजह यहां तो  ट्रायल हो गया!

                          -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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