तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

सुना है -धर्मेन्द्र कुमार पाठक


सुना है
एक नए कलयुगी
महाभारत का
आगाज हो रहा है!
खुलेआम
धृतराष्ट्र का आत्मज
ताल ठोक रहा है.…
एक बार फिर
वह अपने कुल को
युद्ध की अग्नि में
झोंक रहा है
और 
न्याय के सीने में
स्वार्थ का खंजर
भोंक रहा है...

-धर्मेन्द्र कुमार पाठक

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