तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

नीले नभ से -धर्मेन्द्र कुमार पाठक


नीले नभ से


नीले नभ से  यह स्वर  फूटे-
                 नहीं    प्रेम  का   बंधन  टूटे!

कभी  अंग  को   रक्त न  रंगे,
अब मृत्यु  नृत्य  करे न  नंगे,
शांत     बहो  हे   पावन   गंगे,
                 प्रमोद -घट  नित  भरें  वधूटे!

चतुर्दिक   हो  चारु   हरियाली,
अधरों पर  खुशियों की  लाली,
मधुर   मुस्कान  प्यारी-प्यारी,
                मन   गाये   औ'  मस्ती   लूटे!

अपनत्व  भरा  सबका  मन हो,
निश्छल निर्मल सबका मन हो,
प्रेमल पुलकित  जीवन-धन हो,
               कभी   न   कोई   हमसे   रूठे!
                           
                             -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.


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