तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

मगही निर्गुण-धर्मेन्द्र कुमार पाठक

मगही निर्गुण 

लहँगा   संभालूँ    कइसे  बाली   उमरिया   में.
मइया  गे  मइया  बड़ा  डर लागे  डगरिया में.

सजनवां   से  कइसे  मिले  जाईं   सेजरिया में;
का जनि का लग गेलो हमर कोरी चुनरिया में.

नजरिया मिलावल ना जाय अब कोहबरिया में;
सइयां कस के गह लेलन  हमरा अकबरिया  में.

खुशी के  चाँद   हमर छिप गेलो  इ  अंधरिया में;
ढूंढूं      कइसे   सइयां    सलोने     इंजोरिया   में.

जियरा हमर सट गेलो सखि अपन सांवरिया में;
केकरा   लेके  हम  अब  घूमें  जाईं   बजरिया में.

कोई आउ सूझे न अब सखि  हमर  नजरिया में;
चाँद   हमर  छिप  गेल  कारि-कारि   बदरिया में.

नाक  के  नथनिया  हेरा  गेल  अब बजरिया में;
पग  कइसे  धरुं हम सखि घरवा के डगरिया में.

                                  -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.  



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