तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

भरोसा -धर्मेन्द्र कुमार पाठक




भरोसा   तो   कोई  भी  तोड़   सकता  है।।  
संकट  में  अब  अकेला  छोड़ सकता  है।।

किसी की बातों पर  यकीन  नहीं  होता;
कोई   भी  अपना  वादा  तोड़ सकता है।।

यूं  तो  सफर   में  मैं  अकेला   रहता हूं;
मुझसे  रिश्ता  कोई  भी  जोड़ सकता है।।

मुझे  किसी  से   कोई  उम्मीद  नहीं   है; 
रास्ते में कोई भी  हाथ मरोड़  सकता है।।

बुरा   मानो   या   भला   मेरे    शरीर   के
 रक्त   को   कोई   भी निचोड़  सकता  है।।

यूं   ही   नहीं   आजकल   मैं   मजे  में  हूं;
ईश्वर   हर  मौज  का  रुख मोड़ सकता है।।

बहती  हुई  नदी   में  सब   बह   सकते  हैं, 
बस 'धर्म' ही धार  का मुख  मोड़ सकता है।।

                               -धर्मेन्द्र कुमार पाठक 

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