तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

जीवन-धर्मेन्द्र कुमार पाठक




                जीवन 

कितना   अनुपम   यह   जीवन  है.
सुख-दुख  का नित मधुर मिलन है.

चंचल    मन   की    मादकता   से,
कभी   स्नेह  की    समरसता    से,
गत्वर    जीवन   का    प्रतिक्षण  है.

जैसे    कलिका    की     कोमलता,
अलि    को     भटकाती   चंचलता,
परिमल     से     भरा   तपोवन   है.

करुण    उदासी   पतझड़  की  भी,
जीवन    लाता    ऐसे     क्षण   भी,
अश्रु-हास   का   विरल   कलन   है.

जभी      खुलेंगी     चेतन     आंखें,
फैलेंगी     तब       जीवन     शाखें,
सहज     सुलभ   मेरा   भी  मन  है.

                  -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

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