तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

औरत की मजबूरियां -धर्मेन्द्र कुमार पाठक



समाज  की यह कैसी विचित्र मजबूरियां!
औरतों  के  हाथ में  सौ-सौ  हथकड़ियां!!

आजादी  का  जश्न  लगता बहुत  फीका,
औरतों  को  घर में  ही  इतनी ड्योढ़ियां!

सिर्फ   कहने  को  भारत  है  हमारी  मां,
औरत  के  पांव  में  इतनी क्यों  बेड़ियां!

सभी जगह डर का एक अनजान साया, 
उसके  लिए  जैसे  सिमटी  हुई  दुनिया!

हर शख्स क्यों अब दीख  रहा है शैतान,
औरत  के लिए  दिल में सिर्फ हैवानियां!

वक्त  ठहरता  है  कहां  किसी  के  लिए, 
ठहर  जाती  हैं बस जिंदगी की घड़ियां!

                                -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

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