तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

जेठ की जवानी -धर्मेन्द्र कुमार पाठक



वैैशाख को मिल गयी जेठ की जवानी। 
     और धरती चिल्ला रही है -"पानी! पानी!!"

            आज गाय-भैंस के फेफड़े फूल रहे,
                 बछड़े-बछड़ियों के नथूने झूल रहे,
                        मृग-मृगा मरीचिका में भूल रहे; 
                             तड़फड़ा रही जंगल की रानी॥ 

        रेत में धँस गये ऊँटों के पाँव, 
            फ़सलों के जलने से सूना हुआ गाँव, 
                        श्रृंगालों के सारे उलटे हुए दाँव; 
                        छप्पर जले बची बस घर की निशानी॥

 ऊपर से सूर्यदेव दाग रहे गोले,
      पवन के हाथों में हैं आग के शोले, 
        कृपा करो हे, महादेव बमबम भोले;
                   पूरे पूर्वोत्तर की यही है कहानी॥

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