तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

नियामक -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

नभ के 
नीले आस्तरण पर
सूर्य का
सम्मोहन!
धरा
अनायास
उसीके परितः
अनवरत
करती
दिन-रात नर्त्तन!
जड़-चेतन
सबके सब
बँधे हुए-से
सोते-जागते
अणु-परमाणु
सूक्ष्म-जीवाणु
सबका
संलयन!
फिर भी,
कोई विस्फोट नहीं.
अपितु
प्रकृति का चिर-मिलन!
जीवन
मात्र संयोग नहीं,
भोग और उपभोग नहीं,
निश्चय 
ही 
इसका 
कोई नियामक
करता है
निर्धारण!
गढ़ता है
आवरण.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मोहब्बत -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

प्राणों का जंगल -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

अलग ही मजा है ! -धर्मेन्द्र कुमार पाठक