तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

एक गीत(पूज्य पिताश्री को समर्पित)-धर्मेन्द्र कुमार पाठक

आप तो यूं ही मुस्कुराते चले गए।
हम बेरहम वक्त के हाथों छले गए!

       तन्हाई का चल रहा एक नया दौर,
      टीस रहे स्वप्न जो थे कभी ढले गए।

पूज्य पिताश्री डॉ. सुरेश पाठक 

जीवन की नैया, तेरे प्यार की छैंया,
क्यों कर छिन मुझसे वक्त के पहले गए।

       आखिर आज यह नभ क्यों है इतना लाल,
        ज्यों गाल पर गगन के गुलाल मले गए!



आज तो यह हवा भी चुपचाप बह रही,
लगता है उसके ख्वाब कहीं तले गए!

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