तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

भावनाओं का अंतर्लाप -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

भावनाओं का अन्तर्लाप
समय के साथ
गतिशील
संवेदनाओं के
विविध प्रकोष्ठों में
एक-दूसरे को 
संयोजित करते हुए
हृदय के
आकाश में
विस्तीर्ण हो जाता है
जैसे
पाटल की पंखुड़ियाँ
अपना
सुगंध विखेर
प्रकृति के
वन-प्रान्तर में
शुष्क
धरा पर
फैल जाती हैं
निष्काम..........
निर्लिप्त...........।

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