तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

कुछ अटपटे दोहे -धर्मेन्द्र कुमार पाठक



लोकतन्त्र में नेता की,
राजा जैसी ठाट।
और घर में ग़रीब की,
टूट रही है खाट॥
है लीला यह वोट की,
लो देख करामात।
भिखमंगों को खिलाते,
पूछ-पूछ कर जात॥
जात-पात की राग में,
नेता गाते गीत।
और इसीके आसरे,
चुनाव जाते जीत॥
चारों ओर विकास की,
करते ख़ूब प्रचार।
सत्तासीन होने पर,
देते उसे विसार॥
नेताओं की चाल से,
बँटता रहा समाज।
मतदाताओं की फूट,
पहनाता है ताज़॥

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