तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

ग़ज़ल -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

फिजा में फिर वही खामोश हलचल है।
सैय्याद की बाहों में कैद अब बुलबुल है।।
शहर में छाई है   अब मातमी खामोशी।
शैतानों के घर खूब यहां चहल - पहल है।।
दरख़्तों पर  डाला है  बाजों ने  बसेरा।
सहमा - सहमा आज   सारा जंगल है।।
हर दिल को इतना गहरा पहुंचा है सदमा।
अब  चारों तरफ से    घेरे हुए दलदल है।।
कितना खौफनाक हो गया इस जहां का मंज़र।
कतरा - कतरा  कटा हुआ  अब हरेक गुल है।।
तूफान में  घिरी हुई है  जैसे अब कश्ती।
दोस्तों, मझधार में खोई हुई मंजिल है।।

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