तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

अहं ब्रह्मास्मि -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

अहं ब्रह्मास्मि 

यह
 जो 
विस्तृत 
ब्रह्माण्ड है 
मैं उसका 
एक कण 
मात्र हूं 
लेकिन 
मुझ जैसे 
छोटे से 
कण में भी 
अनेक 
सूक्ष्मत्तम 
कण हैं
और
 प्रत्येक 
सूक्ष्म - से - सूक्ष्म
 कण में भी 
अनेक 
स्वतंत्र 
विस्तृत 
ब्रह्माण्ड हैं
यहां
 प्रत्येक क्षण
 अणु - अणु 
परमाणु - परमाणु
 का
 संलयन - विलयन 
हो रहा है 
असीमित 
ऊर्जा का 
अंतर - रूपांतर
 हो रहा है 
प्रकृति - पुरुष 
अभिव्यक्त 
हो रहे
और
उद्घोषित कर रहे
 - " अहं ब्रह्मास्मि"।
                        -धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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