तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

विकल विश्व -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

विकल विश्व विह्वल मन को आज व्यथित करता है.

             रोती-धोती वसुधा तल में, 

               करुणा भर देती जल में ,  

अवनि से अम्बर तक आज क्रंदनमय दिखता है.

             कैसा बदल गया नभ है,
             सबका बदल गया मग है,
मुँह चिढ़ाती सभ्यता अब देख समय कहता है.
             प्रेमी पागल मन मारे,
            गली-गली प्रीत पुकारे,
 रक्त सने हाथों कोई प्रेम-गीत लिखता है. 
            तेरे मधुर-मधुर मन में,
           बस जाता कोई क्षण में,
विरही पलों के सहारे अन्तर में पलता है.   




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