तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

पहली बार -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

पहली बार
देखा था तुझे 
छत पर
स्वेटर 
बुनते हुये...
मिलते ही नज़र
तुम्हारी
नाज़ुक 
हथेलियों से
कांटों को 
फिसलते हुए...
फ़िर तो न जाने 
ऎसे कितने
वाकये हो गए....
हम एक दूसरे से 
मिलते गए
आंखों में सपने 
तिरते गये
वक़्त की नज़ाकत 
तो देखो
हम एक दूसरे में 
मिटते गए
क्या से क्या 
बनते गए....
           @धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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