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तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर - धर्मेन्द्र कुमार पाठक

तनिक फेरो न नज़र मेरी ओर।।  भर गये मेरे नयनन  के कोर,  कहां हो ओ मनमोहन चितचोर।।१।। तुम  कहां गये हो मुझे अब छोड़, कपोलन पर  ढरकत हैं नित लोर ।।२।। जग में फिर फिर मैं हुआ कमजोर,  सुना ना जाये  कोई अब शोर।।३।। मेरे दुख का नहीं कोई छोर, रहि रहिके दे करेजा खखोर ।।४।।

मैं

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मैं मैं  कोई रिश्ता नहीं, प्यार हूं। तेरे  हृदय का  मृदु  श्रृंगार हूं।। बाहर  मत  तलाश कभी मुझे अंतर  का   शांत  पारावार हूं।। उन्मुक्त जीवन का मधु राग हूं, आनंद का अप्रतिम त्योहार हूं।। तेरी स्मृतियों का मधुर हास हूं, सुनहरे  सपनों  का  संसार  हूं।। © धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

वसंत की छटा -धर्मेन्द्र कुमार पाठक

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पीली  सरसों  वाली  सारी। पहन सज गई धरती प्यारी।। मंजर  से  लदे  सारे  आम। पीकी पुकारे पिय के नाम।। कनेर  हैं  कानों  की  बाली। मौलश्री   होठों  की  लाली।। महुआ के  फूलों की प्याली। ताल - तमाल बजाते ताली।। आंखों  में  ऊंघ  रहे  सपने। पहन  भावनाओं  के  गहने।। बसंत की छटा अति निराली। प्रकृतिक प्यार पगी है थाली।।         © धर्मेन्द्र कुमार पाठक.

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